दुनिया बदल रही है अब बच्चों से ज्यादा बुजुर्ग हो चुके हैं

दुनिया बदल रही है अब बच्चों से ज्यादा बुजुर्ग हो चुके हैं

मानव इतिहास में पहली बार कुछ ऐसा हुआ है जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। आज धरती पर छोटे बच्चों की संख्या पीछे छूट चुकी है और बुजुर्गों की आबादी तेजी से आगे निकल आई है। अमेरिकी जनगणना ब्यूरो की रिपोर्ट्स के मुताबिक, 65 साल से ज्यादा उम्र के लोगों का वैश्विक आबादी में हिस्सा करीब 10.5 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जबकि 5 साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या अब 10 प्रतिशत से भी कम सिमट गई है।

ये आंकड़े सिर्फ साधारण संख्या का खेल नहीं हैं। ये इस बात का सबूत हैं कि हमारी दुनिया की डेमोग्राफी यानी जनसांख्यिकी पूरी तरह पलट चुकी है। अगर आप सोच रहे हैं कि इसका असर सिर्फ कागजों पर पड़ेगा, तो आप गलत हैं। ये बदलाव हमारी रोजमर्रा की जिंदगी, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने को सीधे तौर पर हिला रहा है।

जन्मदर में गिरावट की असली वजह क्या है

बच्चे कम क्यों पैदा हो रहे हैं? सीधी सी बात है, आधुनिक जीवनशैली और आर्थिक दबाव। पिछले कुछ दशकों में लोगों की प्राथमिकताएं बदली हैं। साल 2023 के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया की 71 प्रतिशत से ज्यादा आबादी ऐसे देशों में बसती है जहां प्रजनन दर या जन्मदर 'रिप्लेसमेंट लेवल' (लगभग 2.1 बच्चों प्रति महिला) से नीचे लुढ़क चुकी है। जबकि 2013 में यह आंकड़ा सिर्फ 45 प्रतिशत था।

महंगाई आसमान छू रही है। शहरों में रहना, बच्चों की पढ़ाई और उनका पालन-पोषण करना आम इंसान के लिए महंगा सौदा बनता जा रहा है। लोग परिवार शुरू करने में देरी कर रहे हैं या फिर एक ही बच्चे पर रुक जा रहे हैं। जब एक पीढ़ी छोटी होती चली जाती है, तो अगली पीढ़ी के लिए काम करने वाले हाथों की कमी होना लाजिमी है।

भविष्य का डरावना सच या सिर्फ बदलाव

भविष्य को लेकर जो अनुमान सामने आ रहे हैं, वे हैरान करने वाले हैं। साल 2060 तक दुनिया में 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों की आबादी बढ़कर 2 अरब तक यानी कुल आबादी का लगभग 19.6 प्रतिशत हो जाएगी। इसका मतलब साफ है कि भविष्य में हर पांच में से करीब एक व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक होगा।

एशिया और चीन जैसे देशों में यह बदलाव सबसे ज्यादा डराने वाला है। चीन की आबादी लगातार सिकुड़ रही है और वहां जन्मदर ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले पायदान पर आ गई है। भारत में भी तस्वीर तेजी से बदल रही है, क्योंकि यहां भी जन्मदर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। जापान तो पहले से ही दुनिया का सबसे बुजुर्ग समाज बन चुका है, जहां 30 प्रतिशत से ज्यादा लोग 65 वर्ष के ऊपर के हैं।

स्वास्थ्य और पेंशन व्यवस्था पर मंडराता खतरा

जब समाज में युवाओं की तुलना में बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी, तो सरकारों की दिक्कतें बढ़ेंगी। पेंशन योजनाओं पर भारी बोझ पड़ेगा। स्वास्थ्य सेवाओं यानी हॉस्पिटल्स, डॉक्टरों और ओल्ड एज केयर की डिमांड रॉकेट की तरह ऊपर जाएगी। काम करने वाले युवाओं की फौज छोटी होगी और टैक्स का पैसा बूढ़ी होती आबादी की देखभाल में ज्यादा खर्च होगा।

आप खुद सोचिए। अगर देश में काम करने वाले लोग कम होंगे और देखभाल मांगने वाले वरिष्ठ नागरिक ज्यादा होंगे, तो अर्थव्यवस्था की चाल धीमी पड़ जाएगी। कई देशों में लेबर शॉर्टकट यानी कामगारों की भारी कमी अभी से महसूस होने लगी है।

इस पूरी स्थिति से निपटने के लिए सरकारों और नीति निर्माताओं को सिखों से भरे पुराने ढर्रे को छोड़ना होगा। वर्कफोर्स में बुजुर्गों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाने के रास्ते तलाशने होंगे और उन कारणों पर काम करना होगा जिनकी वजह से युवा परिवार बढ़ाने से कतरा रहे हैं। समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो यह डेमोग्राफिक शिफ्ट आर्थिक संकट का रूप ले लेगा।

RL

Robert Lopez

Robert Lopez is an award-winning writer whose work has appeared in leading publications. Specializes in data-driven journalism and investigative reporting.