पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच इस्लामाबाद से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी घमासान को रोकने के लिए पाकिस्तान ने एक मध्यस्थ के रूप में कदम बढ़ाया है। दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने के प्रयास तेज हो गए हैं। कई हफ्तों से चल रही पर्दे के पीछे की कूटनीति के बाद अब इस्लामाबाद में बातचीत का दौर शुरू हो रहा है।
क्या यह पहल सच में जंग रोक पाएगी? सच कहूं तो यह इतना आसान नहीं है। लेकिन दोनों देशों का बातचीत के लिए तैयार होना ही अपने आप में एक बड़ा संदेश है।
क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इस्लामाबाद की यह पहल क्यों अहम है
ईरान और अमेरिका के बीच पुरानी दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है। हाल के दिनों में खाड़ी क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। इस वजह से पूरे मिडिल ईस्ट में नए युद्ध का खतरा मंडराने लगा था। पाकिस्तान ने सही समय पर हस्तक्षेप किया है।
पाकिस्तान के दोनों देशों के साथ अलग तरह के रिश्ते रहे हैं। एक तरफ ईरान उसका पड़ोसी है, जिसके साथ उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। दूसरी तरफ अमेरिका के साथ पाकिस्तान के सुरक्षा और आर्थिक रिश्ते रहे हैं। इसी संतुलन के दम पर पाकिस्तान दोनों पक्षों को एक जगह लाने में कामयाब दिख रहा है।
तनाव कम होने से सिर्फ तीन देशों को फायदा नहीं होगा। पूरा अंतरराष्ट्रीय समुदाय राहत की सांस लेगा। खाड़ी देश पहले से ही वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंतित थे। अगर यह शांति वार्ता किसी नतीजे पर पहुंचती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आ सकती है।
पर्दे के पीछे की कूटनीति और बैकचैनल बातचीत
यह बातचीत अचानक शुरू नहीं हुई है। राजनयिक सूत्रों के मुताबिक दोनों देशों के प्रतिनिधि पिछले कुछ दिनों से गुप्त बैठकों में शामिल हो रहे थे। इन बैठकों को सुरक्षा एजेंसियों और विदेश मंत्रालयों का समर्थन हासिल था।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस प्रक्रिया को बेहद गुप्त रखा था। मकसद सिर्फ एक था—बिना किसी मीडिया दबाव के दोनों पक्षों को एक साथ लाना।
ईरान की मुख्य चिंता उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध और उसकी सीमा पर अमेरिका की सैन्य मौजूदगी है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने समर्थित गुटों पर लगाम लगाए और परमाणु कार्यक्रम पर पारदर्शिता दिखाए। ये शर्तें काफी कठिन हैं। फिर भी इस्लामाबाद में दोनों देशों के अधिकारियों की मौजूदगी यह साबित करती है कि वे सैन्य टकराव से बचना चाहते हैं।
मुख्य बाधाएं और शांति के रास्ते में चुनौतियां
रास्ता बहुत कठिन है। दोनों देशों के बीच अविश्वास की दीवार इतनी ऊंची है कि इसे एक झटके में गिराया नहीं जा सकता। इतिहास गवाह है कि ईरान-अमेरिका संबंधों में समझौते अक्सर टूट जाते हैं।
सबसे बड़ा मुद्दा सीरिया, इराक और यमन में सक्रिय क्षेत्रीय समूह हैं। अमेरिका इन पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहा है। ईरान का मानना है कि ये उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी हैं।
दूसरी तरफ अमेरिका की आंतरिक राजनीति भी एक बड़ा फैक्टर है। वाशिंगटन में किसी भी समझौते का कड़ा विरोध हो सकता है। ईरान में भी कट्टरपंथी अमेरिका पर भरोसा करने के खिलाफ हैं।
पाकिस्तान की भूमिका यहां केवल एक संदेशवाहक की है। निर्णय अंततः वाशिंगटन और तेहरान को ही लेना है। अगर इस्लामाबाद इन बुनियादी मुद्दों पर दोनों को किसी न्यूनतम सहमति पर ले आता है, तो इसे बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत माना जाएगा।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल बाजार पर असर
जब भी खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, उसका सीधा असर आम इंसान की जेब पर पड़ता है। तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं।
इस बातचीत की खबर सामने आते ही वैश्विक बाजारों ने राहत का संकेत दिया है। अगर शांति वार्ता सफल रहती है, तो कच्चे तेल की सप्लाई चैन में रुकावट आने का डर खत्म हो जाएगा। इससे भारत जैसे ऊर्जा-आयात करने वाले देशों को काफी फायदा होगा।
ग्लोबल ट्रेड के लिए होर्मुज की जलडमरूमध्य बहुत महत्वपूर्ण है। वहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है। ईरान-अमेरिका में तनाव कम होने से इस समुद्री रास्ते पर जहाजों की आवाजाही सुरक्षित रहेगी।
आगे का रास्ता और दुनिया की नजरें
अब देखना यह होगा कि यह बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है। आने वाले कुछ दिन बहुत महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं। इस्लामाबाद में जारी यह प्रक्रिया अगर शुरुआती दौर को सफलतापूर्वक पार कर लेती है, तो उच्चस्तरीय वार्ता का रास्ता साफ हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में ऐसी पहल अक्सर लंबे समय तक चलती हैं। रातोंरात किसी चमत्कार की उम्मीद करना सही नहीं होगा।
आपको इस स्थिति पर करीब से नजर रखनी चाहिए। अगर आप वैश्विक बाजार, ऊर्जा क्षेत्र या अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़े हैं, तो इस्लामाबाद से आने वाले आधिकारिक बयानों और खाड़ी क्षेत्र की सैन्य गतिविधियों पर लगातार ध्यान दें।