डोनाल्ड ट्रंप फिर से व्हाइट हाउस में हैं और पश्चिम एशिया को लेकर उनकी नीति बिल्कुल साफ है। वे ईरान के साथ किसी भी तरह के कमजोर समझौते के पक्ष में नहीं हैं। तेहरान पर अधिकतम दबाव बनाने की उनकी पुरानी रणनीति वापस आ चुकी है। इस बार उनका मुख्य हथियार अब्राहम समझौता है। यह कोई गुप्त रणनीति नहीं बल्कि एक खुला खेल है। मिडिल ईस्ट के समीकरण बदल रहे हैं। अगर आपको लगता है कि पुराना ढर्रा काम करेगा, तो आप गलत हैं।
ईरान इस समय चौतरफा दबाव में है। उसकी अर्थव्यवस्था पहले से ही प्रतिबंधों के बोझ तले दबी है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि केवल सख्त आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध ही ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोक सकते हैं। इसमें अब्राहम समझौते की भूमिका सबसे अहम हो जाती है। यह समझौता इजरायल और अरब देशों के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए शुरू हुआ था, लेकिन अब यह ईरान के खिलाफ एक मजबूत क्षेत्रीय मोर्चे में बदल रहा है। For another view, consider: this related article.
ट्रंप की सख्त नीति और ईरान पर इसका असर
ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका को बाहर कर लिया था। उन्होंने इसे इतिहास का सबसे खराब समझौता बताया था। अब जब वे दोबारा सत्ता में हैं, तो वे उसी नीति को और कड़े रूप में लागू कर रहे हैं। तेहरान को यह समझना होगा कि इस बार रियायतें मिलने की गुंजाइश न के बराबर है।
ईरान के तेल निर्यात पर नए सिरे से कड़े प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। ट्रंप का सीधा लक्ष्य ईरान की कमाई के मुख्य स्रोत को सुखा देना है। जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह बंद नहीं करता और क्षेत्रीय उग्रवादी समूहों को फंडिंग बंद नहीं करता, तब तक वाशिंगटन झुकने वाला नहीं है। यह रणनीति ईरान को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर करने के लिए है, लेकिन उनकी शर्तों पर। Further insight on this matter has been shared by NBC News.
अब्राहम समझौते का बदलता स्वरूप
अब्राहम समझौता सिर्फ राजनयिक संबंधों को सुधारने का जरिया नहीं है। यह मिडिल ईस्ट में एक नया सुरक्षा ढांचा तैयार कर रहा है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और मोरक्को जैसे देश पहले ही इजरायल के साथ खड़े हो चुके हैं। सऊदी अरब भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहा था, हालांकि क्षेत्रीय हालातों के कारण प्रक्रिया थोड़ी धीमी हुई है।
इस समझौते का सीधा संदेश ईरान के लिए है। अरब देश अब इजरायल को अपने दुश्मन के रूप में नहीं बल्कि एक रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहे हैं। ईरान की विस्तारवादी नीतियों और ड्रोन-मिसाइल कार्यक्रमों ने इन देशों को एक साथ आने पर मजबूर किया है। यह नया गठबंधन ईरान के क्षेत्रीय दबदबे को चुनौती दे रहा है।
क्षेत्रीय ताकतों का बदलता रुख और सुरक्षा समीकरण
क्षेत्र में सुरक्षा समीकरण अब पहले जैसे नहीं रहे। इजरायल और अरब देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करना और संयुक्त सैन्य अभ्यास अब आम बात हो चुकी है। ट्रंप इस मोर्चे को और मजबूत करना चाहते हैं। उनका मानना है कि अमेरिका को सीधे युद्ध में कूदने की जरूरत नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय सहयोगियों को इतना मजबूत कर दिया जाए कि वे खुद ईरान को नियंत्रित कर सकें।
ईरान के सहयोगियों जैसे हिजबुल्लाह और हूती विद्रोहियों पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है। जब मुख्य स्रोत यानी ईरान के पास ही धन की कमी होगी, तो इन समूहों को मिलने वाली मदद अपने आप कम हो जाएगी। यह एक लंबी लड़ाई है, लेकिन ट्रंप की रणनीति इसी दिशा में आगे बढ़ रही है।
क्या ईरान के पास कोई और रास्ता बचा है
तेहरान के सामने विकल्प बहुत सीमित हैं। वे चीन और रूस के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। चीन ईरान से तेल खरीदकर उसे थोड़ी राहत जरूर दे रहा है, लेकिन यह अमेरिकी प्रतिबंधों के पूर्ण प्रभाव को रोकने के लिए काफी नहीं है। रूस खुद अपने मोर्चों पर व्यस्त है, इसलिए वह केवल कूटनीतिक समर्थन ही दे सकता है।
ईरान के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है। खराब आर्थिक स्थिति के कारण आम जनता परेशान है। मुद्रास्फीति आसमान छू रही है। ऐसी स्थिति में सरकार के लिए लंबे समय तक इस दबाव को झेलना मुश्किल होगा। ट्रंप इसी आंतरिक कमजोरी का फायदा उठाना चाहते हैं।
इस पूरी स्थिति को समझने के लिए आपको केवल बयानों पर नहीं, बल्कि जमीन पर हो रहे बदलावों पर ध्यान देना होगा। प्रतिबंध कड़े हो रहे हैं, तेल के टैंकर रोके जा रहे हैं और वित्तीय लेन-देन पर नजर रखी जा रही है। यह कोई अस्थायी नीति नहीं है, बल्कि आने वाले सालों के लिए पश्चिम एशिया का नया खाका है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों के लिए अब अगला कदम स्पष्ट होना चाहिए। कंपनियों और सरकारों को अपनी ऊर्जा नीतियों और व्यापारिक समझौतों को इसी बदलते परिदृश्य के हिसाब से ढालना होगा। ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों को अमेरिकी प्रतिबंधों के कड़े रुख को ध्यान में रखकर ही अपनी रणनीतियां बनानी होंगी, क्योंकि इस बार नियमों में ढील मिलने की उम्मीद करना भारी भूल साबित हो सकती है।